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लेह लद्दाख यात्रा

leh ladakh yatra

आज अपनी लेह लद्दाख यात्रा के बारे में कुछ लिखने की सोच रहा हूँ…. लेख क्रमवार लिखने की कोशिश करूँगा जिससे मेरे मित्रगणों में कोई भविष्य में लेह यात्रा करना चाहें तो उन्हें कुछ आसानी हो….

सबसे पहले लद्दाख के बारे में कुछ बताना चाहूँगा । भारत के जम्मू कश्मीर प्रान्त से सुदूर उत्तर पूर्व क्षेत्र में ये शीत मरुस्थल स्थित है, जो अपने दुर्गम रास्तों, नीरवता और अदभुत प्राकृतिक भूदृश्यों के लिए प्रसिद्ध है… सीधी सी बात है प्रकृति से प्रेम करने वालों के लिए प्रकृति का ये रूप भी देखना इच्छित होता है… लेकिन मुझे लगता है ज्यादातर लोग लद्दाख में अपनी ड्राइविंग के शौक को पूरा करने आते हैं…. क्योंकि इस रास्ते की दुरूहता ही इसके रास्ते को खूबसूरत बनाती है…. लद्दाख घूमने में आप दुनिया के सबसे ऊंचे रास्तों से गुजरते हैं…तो सबसे पहले यात्रा की तैयारियों के बारे में बात करूँगा

1. सबसे पहले लेह जाने के लिए आपके दिमाग में हद दर्जे का पागलपन और जुनून होना चाहिए.. आपको रिश्तेदार और मित्र ज्यादातर वहाँ के कठिन परिस्थितियों के नाम पर हतोत्साहित करेंगे… तो खुद पे कुछ भरोसा कीजिये और कुछ भगवान पे भरोसा कीजिये

2. इस साल नए नियमों के अनुसार आप नुब्रा घाटी और पैंगंग झील जाने के लिए आप दूसरे राज्य के टूरिस्ट वाहन नहीं ले जा सकते आपको लेह की ही स्थानीय टूरिस्ट वाहन या फिर अपना निजी वाहन ले जाने की अनुमति मिलेगी

3. मेरे ख्याल से अपने निजी वाहन से जाना आपको ज्यादा आजादी देगा और खर्च बहुत कम आएगा(टैक्सी से लगभग 1/3 सस्ता पड़ेगा) और अपनी गाड़ी से अपने ड्राइविंग के शौक की सीमाओं को तलाश सकते हैं…. यकीन मानिए आपके गाड़ी चलाने की हर कला का परीक्षण इस रास्ते में हो जाएगा

4. अपनी निजी गाड़ी तैयार करने के लिए उसकी सर्विसिंग कराएं… खासकर कि ब्रेक शू, कूलिंग सिस्टम, क्लच प्लेट और इंजिन की विशेष जांच कराएं और सर्विस के बाद 100कि मी चला के देख लें कि कोई समस्या तो नहीं आ रही

5. ध्यान दें कि गाड़ी का ग्राउंड क्लेरेंस कुछ ज्यादा हो..(अगर सावधानी पूर्वक चलाएं तो आप स्विफ्ट जैसी कार भी आराम से ले जा सकते हैं) इसके अलावा 5टन क्षमता की खींचने वाली रस्सी, डीजल के लिए डब्बा, एम सील, कूलैंट, पंक्चर किट, टायर इंफ्लेटर रख लें

6. गाड़ी के सारे पेपर सही करें मसलन गाड़ी का कागज, इंसोरेंस और प्रदूषण नियंत्रण जरूर बनवा लें ये चेक होता है

7. मनाली के रास्ते जाने के लिए आपको पास की जरूरत पड़ेगी तो आप मनाली डिस्ट्रिक्ट वेबसाइट पे जाके ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं… ध्यान दें कि पास लेह तक का बनाएं

8. लेह से आगे घूमने के लिए आपको लेह के डी सी कार्यालय में जाके आवेदन करना होगा… वहाँ10 बजे से पहले पहुंच जाएं तो आसानी होगी

9. लेह के रास्ते में आप काफी ऊँचाई पर सफर करते है तो AMS(Accute Mountain Sickness) होने की संभावना रहती है… अपने साथ सूती कपड़े में बांध के कपूर रखें और डायमोक्स दवाई ले लें… इसके अलावा ठंड से बचने के लिए गर्म कपड़े रखें

हाँ तो भाई ये आपके लिए शुरुआती निर्देश हैं लेह यात्रा के जिसका हमने भी लगभग 95% पालन किया

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पंग से सरचू का रास्ता.... कहीं भी भूस्खलन हो जाता है यहाँ....

लेह यात्रा करना और वो भी अपनी गाड़ी से खुद ड्राइव कर के, ये मेरे जीवन के भौतिक सपनों में से एक था…. शादी के बाद अर्धांगिनी भी मनसा, वाचा, कर्मणा मेरे सपनों को अपना बना के जीने लगीं तो एक साथी तैयार था… दूसरे साथी के तौर पे मेरा छोटा भाई जो बिल्कुल मेरी तरह है…. तो हम तीनों ने ये योजना पिछली गर्मियों से ही बनानी शुरू कर दी कि चलना है

सैकडों वीडियो देखें यू ट्यूब पे, इंटरनेट पे सर्च किया और सबसे बड़ी बात कि मन को मजबूत किया कि कोई चाहे जो कहे, चलना है तो चलना है….घर पर 27 मई को बड़े पिता जी की पुण्यतिथि मनाने के बाद हमारी निकलने की योजना थी…. घर में कुछ बड़ों को मना लिया था और कुछ के लिए सोचा कि लौट के डाँट खा लूँगा… मैं बड़ा था तो किसी अनहोनी की जिम्मेदारी मेरी थी…. सारी तैयारियों के बीच मन में कभी कोई शंका होती तो खुद को दिलासा दिया…. हाँ, न जाने का ख्याल मन में कभी नहीं लाया

हमारा रास्ता ये था – जौनपुर, दिल्ली, अमृतसर, पहलगाम, श्रीनगर, सोनमर्ग, कारगिल, लेह, नुब्रा, पैंगंग सो, हानले, सरचू, रोहतांग, मनाली, दिल्ली और वापस घर… जाने से एक रात पहले चिंता में लेटा था तभी भाई ने आके बताया श्रीनगर में माहौल खराब हो गया है और बम्बई में बड़े पिता जी की तबियत ज्यादा खराब हो गयी है…. मैं खुद को दिलासा दे के सो गया कि जो होगा देखेंगे

अगली सुबह हमने यात्रा शुरू कर दी… लखनऊ आगरा एक्सप्रेस वे और यमुना एक्सप्रेस वे से होते हुए हम सब शाम तक दिल्ली (लगभग 800कि मी)आ गए…. दिल्ली से अगली सुबह हम अमृतसर के लिए निकले… एन एच 44 पे चलते हुए हमें रास्ते में भारत पाकिस्तान बस भी मिली… 471 कि मी का सफर सुबह 6 बजे से चल कर हमने दोपहर 1 बजे तक खत्म कर लिया…. अमृतसर पँहुच के सबसे पहले हमारे राष्ट्रीय तीर्थ जलियां वाला बाग गया… फिर अपने अनुज के सौजन्य से वाघा बॉर्डर पर वी आई पी लाउन्ज में शाम की परेड देखी…. रात में आराम करके अगली सुबह पूरी दुनिया मे सिख आस्था के सबसे बड़े केंद्र स्वर्ण मंदिर गया…. निष्काम सेवा का इससे बड़ा केंद्र आपको नहीं मिलेगा…. इसके बाद हम अपने दिन के गंतव्य पहलगाम के लिए निकल पड़े… दोपहर 1 बजे हम ऊधमपुर पहुँचे तो हमारी यात्रा का सबसे बड़ा व्यवधान मिला

Leh Manali Road

जम्मू कश्मीर पुलिस ने आगे का रास्ता बंद कर रखा था… और बोला कि शाम तक खुलने के आसार नहीं हैं… हमें और खबरें भी मिलनी शुरू हुईं कि पत्थरबाजी इस समय जोरों पर है और दूसरे राज्य की गाड़ियों को विशेष निशाना बनाया जा रहा है…. 1 घंटे इंतजार करने के बाद हमें फैसला लेना था कि कश्मीर में फसने का जोखिम लें या फिर पूरा रास्ता बदल के मनाली का रास्ता लें…. मैंने सोचने में ज्यादा समय नहीं लिया और दोपहर 3 बजे हम वहाँ से वापस हो लिए… बीच मे रामसर झील के पास हमने 1 घंटे का विश्राम लिया और फिर पठानकोट होते हुए धर्मशाला पहुंचने का लक्ष्य बनाया

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dharamshala stadium

धर्मशाला पहुँचने के बाद अगली सुबह हमें मनाली के लिए निकलना था… धर्मशाला से मनाली की दूरी लगभग 235 कि मी है…. समतल क्षेत्र में ये दूरी कुछ भी नहीं लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में ये दूरी बहुत मायने रखती है… सुबह उठ के तैयार होने के बाद हमने सोचा कि धर्मशाला घूमने के चक्कर में पड़ेंगे तो पूरा दिन इधर ही बीत जायेगा…. और उधर घर पहुचने के लिए भी दबाव बढ़ रहा था…. हम सुबह जल्दी निकले और केवल धर्मशाला स्टेडियम देख कर मनाली के लिए निकल पड़े…. स्टेडियम से धौलाधार पर्वतमाला के नयनाभिराम दृश्य देख कर आप मंत्रमुग्ध हो जायेंगे…. यहाँ आयें तो इस स्टेडियम में जरुर आयें इसका एक गेट हमेशा खुला रहता है अन्दर आने के लिए

हिमाचल प्रदेश में ड्राइविंग के बारे में कहना चाहूँगा कि यहाँ की सड़कें खूबसूरत तो हैं ही साथ में यहाँ के रास्तों में उत्तराखंड जैसी कठिनाई नहीं है…. तो आप थोडा सावधानी बरतते हुए इस पूरे खूबसूरत रास्ते का आनंद उठा सकते हैं…. हमारे रास्ते में पालमपुर, बैजनाथ, जोगिन्दर नगर, मंडी और कुल्लू पड़े….. अधिकतर रास्ते में हम व्यास नदी के किनारे ही चलते रहे जिसमे से मंडी से मनाली तक का रास्ता बेहद खूबसूरत है…. वहाँ रुक कर एक भी फोटो न लेना और भागने की जल्दी आज भी खलती है कि हमें पूरे रास्ते की अच्छी फोटो और वीडियो लेना चाहिए था…. लेकिन हमारे मन में तो केवल एक शब्द नाच रहा था ‘लेह’

खारदुंग गाँव

शाम 4 बजे हम मनाली पहुँच गए… इतना सुन्दर मनाली हमें दिल्ली के चांदनी चौक से ज्यादा भीड़-भाड़ वाला मिला… इतना ट्रैफिक ! जैसे लगा कि पूरा उत्तर भारत घूमने के लिए मनाली ही आया हुआ है…. गर्मी में यहाँ जब भी आयें तो होटल की व्यवस्था कर के आयें नहीं तो समस्या हो सकती है… हमने होटल ऐसी जगह लिया जहाँ से सुबह रोहतांग के लिए निकलने में आसानी हो….. यहाँ आने वाले सभी यात्रियों का मुख्य आकर्षण होता है रोहतांग दर्रा जाना.. क्योंकि रोहतांग ऐसी निकटस्थ जगह है जहाँ सैलानियों को बर्फ में खेलने का मौका मिलता है

पिछले कुछ वर्षों में रोहतांग में इतनी भीड़ होने लगी कि पहाड़ों में 30 कि मी से लम्बा जाम लगने लगा… बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने रोहतांग जाने वाली गाड़ियों की संख्या सीमित कर दी है… अब रोजाना केवल 800 पेट्रोल गाड़ी और 400 डीजल गाड़ी को ही रोहतांग जाकर आने की अनुमति मिलती है… ये पास आप ऑनलाइन या मनाली एस डी एम् के कार्यालय से बनवा सकते हैं… लेह जाने वाली गाड़ियों की संख्या सीमित नही की गयी है… आप लेह का पास बनवा कर आगे जा सकते हैं

खैर सुबह 4 बजे हमने होटल छोड़ दिया और रोहतांग की तरफ निकल पड़े…. खूब बारिश ने हमारा स्वागत किया… इतनी जल्दी निकलने के बावजूद पहले चेकपोस्ट मढ़ी के पहले हमें गाड़ियों की लम्बी क़तार दिखी…. मनाली से रोहतांग के रास्ते की ख़ूबसूरती शब्दों में बयां करना मुश्किल है… सरे रास्ते आपको हरे घास के मैदान ‘बुग्याल’ और चीड़ के पेड़ों के जंगल मिलेंगे….. चूँकि चढ़ाई ज्यादा है तो रास्ता खूब घुमावदार और खतरनाक है… ध्यान दें यहाँ गाड़ी चलते हुए स्थानीय चालकों से प्रतिस्पर्धा न करें…. इन्हें रास्ते की जानकारी है तो तेज गाड़ी चलाते हैं… आप आराम से अपनी चाल में चलें

आराम से चलते हुए और हलकी बारिश के बीच नयनाभिराम दृश्यों का आनंद लेते हुए हम उस जगह तक पहुँच गए जहाँ से बर्फ दिखनी शुरू हो जाती है…. अचानक अफवाहों का बाजार गर्म होने लगा कि आगे रास्ता बंद है… खैर यहाँ बारिश अब बर्फ़बारी का रूप ले चुकी थी तो पहिये के फिसलने की समस्या शुरू हो गयी…. ऊपर बर्फ़बारी 1 फुट से 8 फुट तक हुई थी… भला हो उन बी आर ओ के जवानों का जो हर परिस्थिति में रोड को चलने लायक बनाये रहते हैं…. रास्ते में ही एक मोडदार चढ़ाई पर सामने चल रही इंनोवा गाड़ी की गलती की वजह से मेरी गाड़ी फिसल के पीछे आ गयी…. उस समय मुझे लगा कि पहली चढ़ाई में ही ये हाल है तो आगे क्या होगा… लेकिन फिर कुछ तकनीकी सीख के साथ आगे बढ़ा…. थोड़ी ही देर में हम रोहतांग दर्रे के ऊपर ऊपर थे…. भयंकर बर्फ और कीचड चारों तरफ थी…. यहाँ थोडा समय बिता कर हम नीचे उतरने लगे

rohtang manali road

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रोहतांग दर्रे के उस तरफ की दुनिया ही दूसरी है… कल कल कर के बहती हुई चेनाब नदी और चारों तरफ फैले हरे घास के मैदानों ने हमारा स्वागत किया… यहाँ से एक रास्ता दायीं तरफ लाहौल स्पीति की तरफ चला जाता है… जिसने राहुल सांकृत्यायन को ठेले पर हिमालय लिखने के लिए प्रेरित किया

हाँ तो आइये अब आपको उन वादियों से आगे ले चलते हैं जो कड़ी मेहनत के बाद रोहतांग दर्रा पार करने के बाद मिलती है… रोहतांग दर्रे से नीचे उतरते-उतरते लगभग 9 बज गए थे… नीचे उतरते ही आपको एक चेक पोस्ट और बाजार के दर्शन होंगे ये जगह खाक्सर है… लेह जाने की परमिट आपको यहाँ पंजीकृत करनी होती है…. सुबह 4 बजे से उठ के गाड़ी में बैठे रहने के कारण हम सब काफी भूखे थे… यहाँ के छोटे ढाबों पे आपको अच्छा नाश्ता मिल जायेगा… हमने हिमालय का सदाबहार नाश्ता मैग्गी खाया… सदाबहार इसलिए कि इन ऊँचाइयों पे आपको ये हर जगह मिल जाएगी…. यहाँ से नाश्ता कर के और परमिट का पंजीकरण करा के हम सब आगे के लिए निकल पड़े

इस जगह के बारे में तो आपको थोडा बता ही दिया था कि यहाँ की हरियाली, बगल बहती नदी, ऊपर हिमाच्छादित पर्वत आपको अहसास कराएँगे कि आप नयी दुनिया में आ गए हैं…. इसकी वजह भी है कि हम लाहौल स्पीति घाटी में आ चुके थे…. हमारा रास्ता चेनाब नदी के किनारे बढ़ा जा रहा था…. रास्ता अच्छा था तो हम अच्छी गति से चल पा रहे थे…. रास्ते में दो छोटे कसबे पड़े

फिर टंडी आया जहाँ से हमें ये अहसास हुआ की हम सामान्य दुनिया छोड़ आये हैं…. वजह थी यहाँ का पेट्रोल पम्प जिसके बोर्ड पर लिखा है कि अगला पेट्रोल पम्प 365 किमी आगे है….. बड़ी गाड़ी लेके चलने वाले यहाँ अलग से कैन में ईंधन लेके चलें तो चिंता नहीं रहेगी.. श्री मती जी की तबियत ख़राब होना शुरू हो चुकी थी…. वजह थी इतनी ऊंचाई और ठण्ड की वजह से ऑक्सीजन की कमी और बुखार…. इसके लिए हमें केलोंग कस्बेके अन्दर जाके दवाई लेना पड़ा…. (ये मैं इसलिए बता रहा हूँ कि आप पहले से ही सामान्य दवाइयां ले के चलें नहीं तो यहाँ दवाई मिलना बहुत मुश्किल है

केलोंग से निकल के हम सब खूबसूरत जिस्पा के बगल से होते हुए चलते रहे… जिस्पा गाँव बहुत सुन्दर है जो भागा नदी के किनारे बसा है…. (यही नदी आगे चंद्र नदी से मिल के चन्द्रभागा नदी बन जाती है) यहाँ रुकने का इंतजाम भी है…. आने या जाने में एक बार इधर जरुर रुकना चाहिए…. आगे दार्चा घाटी में उतर के हमने फिर परमिट दिखाई…. यहाँ से एक दुर्गम रास्ता किश्तवार – श्रीनगर के लिए भी जाता है जो और भी खतरनाक है

फिर रास्ते का सबसे दिलचस्प हिस्सा आया जिंग जिंग बार…. वैसे तो ये एक दर्रा है लेकिन टेढ़े मेढ़े रास्ते और बर्फ की मोटी चादर के चलते यहाँ का दृश्य नयनाभिराम था… दर्रे के सबसे ऊँचे बिंदु की ऊंचाई 4850 मीटर या 15912 फीट थी… लेकिन यहाँ नमी की अधिकता के कारण बर्फ 13 फुट तक जमी थी…. पतले रास्ते के दोनों तरफ बर्फ की दीवालें थीं… सामने से आने वाली गाड़ी के लिए बीच-बीच में कुछ अतिरिक्त जगह बनाई गयी थी…. जिंग जिंग दर्रा उतरते ही अच्छे रास्तों का साथ छूट गया… यहाँ से हमने ड्राइविंग भी बदल ली अब छोटा भाई गाड़ी चला रहा था… दर्रे से उतरने के बाद की दुनिया और बदल गयी…. अब हम उस क्षेत्र में थे जिसको शीत मरुस्थल बोलते हैं… इसकी वजह यहाँ पर नमी के बादलो का न पहुँच पाना हो सकता है… सामने के पहाड़ जैसे मिट्टी के ढेर लग रहे थे…. उनके बीच से निकली चट्टानें अलग ही दृश्य प्रस्तुत करती हैं…वहाँ से लगभग 1 घंटे की यात्रा के बाद हम सर्चू पहुँचे जहाँ हमने आज रुकने का सोचा था

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जब हम सर्चू पहुँचे तो शाम के 5 बज रहे थे… लेकिन धूप इतनी तेज थी जैसे अपराह्न के 3 बज रहे हों… असली जुल्म तो तब हुआ जब हमने अपनी गाड़ी का दरवाजा खोला… 50-60किमी की रफ़्तार से कुल्फी ज़माने वाली ठण्डी हवा चल रही थी…. और सर्चू की ऊंचाई 4290 मीटर या 14070 फुट है… आप इस ऊंचाई पे थोड़ी देर रहें तो आपको कुछ नहीं पता चलेगा लेकिन जब इतनी ऊँचाई पे आपको रात बितानी हो तो आपको जितनी ऑक्सीजन चाहिए उससे काफी कम आपको मिलेगी…. फलस्वरूप हमें भी यहाँ थोड़ी देर बाद सांस लेने में कठिनाई महसूस होने लगी… यहाँ रुकने के नाम पे आपको टीनशेड के अस्थाई आवास मिलेंगे जिसे स्थानीय लोग मई से अक्टूबर तक चलाते  हैं…. हमने एक शेड ले लिया रहने के लिये…. अजीब स्थिति थी दरवाजा बंद करो तो बंद कमरे में सांस फूल रही थी और दरवाजा खोलो तो बर्फीली हवा जान ले रही थी… वहाँ हमारी मुलाकात 3 बहादुर मोटर साइकिल चालकों से हुई जो लेह से लौट रहे थे…. इनमें से एक थे निशांत श्रीवास्तव जो खुद एक ट्रेवल ब्लॉगर हैं….. छोटे भाई ने उनसे आगे के रास्ते के बारे में ढेर सारी जानकारी ली

वहाँ तक पहुचने की दुरुहता का वर्णन इन बातों से कर सकता हूँ कि एक परिवार के कुछ सदस्य दो गाड़ियों में आ रहे थे और जिंग जिंग बार की बर्फ में उनकी आगे वाली इंडिगो फिसल कर पिछे आ रही स्कार्पियो की शक्ल बिगाड़ दी…. एक जन अस्टिलो ले कर आये थे उन्होंने ने भी वही से वापसी लेने का सोच लिया…. रात 9 बजे तक वहाँ रुके सभी लोगों ने पास स्थित बी आर ओ के कैंप में जा कर डाक्टर की सेवा ली… हमने भी अपना ऑक्सीजन लेवल चेक कराया जो कम था…. सभी सर दर्द से जूझ रहे थे….. डाक्टर की दवाइयों से कुछ आराम तो हुआ लेकिन पिछले कई सालों में हमने इससे बुरी रात नहीं बिताई थी…. सारे कपडे पहन के रजाई ओढ़ के सोने के बावजूद रात भर सर दर्द किया

सुबह उठे तो हालत और ख़राब थी…. लग रहा था शरीर से किसी ने ताकत निचोड़ ली हो…. पैर घसीट के चलते हुए हम नित्य कर्म से निवृत्त हुए और तय किया कि जितनी जल्दी सर्चू छोड़ देंगे उतनी जल्दी स्वस्थ हो जायेंगे…. बाहर धूप थी लेकिन कार के इनफार्मेशन डिस्प्ले में तापमान -3 डिग्री सेल्सियस था…. लेह की तरफ केवल 4 लोग निकले बाकि वहीँ से वापस हो लिए

आज भी इस वर्णन में सर्चू का जिक्र करते ही रोंगटे खड़े हो गए… जिसे तमंचे पे डिस्को करने का शौक हो वो एक रात सर्चू में जरुर बिताएं…. लेकिन रात का एक अनोखा अनुभव भी आपको बताना चाहूँगा कि इतना साफ़ आसमान मैंने रात में कभी नहीं देखा था…. सितारे जैसे आसमान में लटके एल ई डी बल्ब जैसे लग रहे थे… चांदनी में नीरव शांत पहाड़ अपनी छटा बिखेर रहे थे…. मानो ये शापित देवता हों जिन्हें अनंतकाल के लिए एक जगह स्थिर और मूक रहने का शाप मिला हो…..बहुत हो गया भाई आज… लेकिन लेह अभी लगभग 190किमी है

हम खतरनाक सरचू में रात बिता कर अगली सुबह लेह के लिए निकल पड़े… हम तीनों की तबियत ख़राब थी… सरचू से 78 किमी बाद पंग आता है इस बीच आपको किसी भी तरह की मदद मिलने की उम्मीद ना के बराबर होती है… और इस रास्ते का शुरुआती 35 किमी तो ठीक है उसके बाद का रास्ता आपको इस रास्ते पे आने के लिए अफ़सोस करा देगा… और बीच में कुछ जगह तो ऐसी स्थालाकृतियाँ दिखेंगी जिन्हें देख कर सुखद दहशत होगी आपको

तो सरचू से लगभग 18 किमी आगे आने पर इस रास्ते के मुख्य आकर्षण में से एक गाटा लूप्स मिला…. ये नदी के बगल चलते रास्ते से आपको 21 तीखे मोड़ों से होते हुए अचानक 4190 मीटर से 4630 मीटर की ऊंचाई पर पहुंचा देते हैं… लगातार 21 लूप (घुमावदार रास्ता) से होते हुए चढ़ने में आपका सर घूमना स्वाभाविक है…. यहाँ की एक डरावनी कहानी आज लिख रहा हूँ जिसका जिक्र उस समय मैंने पत्नी और भाई से भी नही किया था… एक कहानी के अनुसार एक ट्रक ड्राईवर और उसके सहायक का ट्रक इन चढ़ाइयों पे बिगड़ गया था… ड्राईवर मदद खोजने चला गया और वो सहायक वही रह गया और तभी बर्फीला तूफ़ान आया और वो सहायक बीमार और असहाय उसी तूफ़ान में वही गाटा लूप्स पे प्यासा मर गया… इस कहानी के कई संस्करण हैं… कहते है तब से कई लोगों को गाटा लूप्स पे एक आदमी पानी की मदद मांगते दीखता है… और लूप्स पे पूरा चढ़ने पे आपको एक समाधि मिलेगी जिसपे आने जाने वाले पानी की बोतल रखते चले जाते हैं

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गाटा लूप्स पे चढ़ने के बाद लगभग उसी ऊंचाई पे ख़राब रास्ते पर कुछ दूर चलते रहने के बाद हम नकीला पास पर पहुंचे जो इस रास्ते का तीसरा सबसे ऊँचा दर्रा है जिसकी ऊंचाई 4739 मीटर(15547 फ़ीट) है…. यहाँ आप देखेंगे कि कई पत्थरों को एक दूसरे के ऊपर सलीके से सजा के बहुत से ढेर बने हैं…. इसकी भी एक मान्यता है कि ऐसा करने से आपकी घर बनाने की मनोकामना जल्दी पूरी होती है(हमने नहीं बनाया क्योंकि ये बात हमें वहाँ से लौटने के बाद पता चली) फिर ऐसे ही ऊँचे नीचे और ख़राब रास्तों से होते हुए इस रास्ते के दूसरे सबसे ऊँचे दर्रे पे पहुँचे जिसका नाम लाचुलुंग ला है इसकी ऊंचाई 5065मीटर (16116 फ़ीट) थी… हम ख़राब रास्तों से इतना परेशान थे कि बस किसी तरह पंग पहुचने की सोच रहे थे…. पंग से 5-6 किमी पहले का रास्ता ऐसा है कि आपको किसी संकरे रेगिस्तानी पहाड़ में चलने का अहसास होगा… खैर हम 11बजे तक पंग पहुँच गए… अभी भी सर दर्द ने हमारा पीछा नहीं छोड़ा था

पंग भी कमोबेश सरचू जैसा ही है यहाँ आपको कुछ नाश्ते की दुकान, कुछ अस्थायी सराय और बहादुर बी आर ओ का कैंप मिलेगा… हमें यहाँ दवाई नही मिली…. पंग से थोडा ऊँचाई चढ़ते ही आपको फिर एक नयी और आश्चर्यचकित करने वाली स्थलाकृति मिलेगी जिसका नाम है मूर मैदान…. इतने पहाड़ों को पार करने के बाद इस ऊँचाई(4700मीटर या 15400फ़ीट) पर बड़े समतल मैदान का मिलना आपको सुखद आश्चर्य से  भर देगा… इतनी देर पहाड़ी संकरे रास्तो में गाड़ी चलाने के बाद यहाँ आपको समतल मैदानों की तरह चौड़ी सड़क मिलेगी… कुछ साल पहले तक यहाँ सड़क भी नहीं थी… लगभग 50किमी लम्बे इस मैदान में सब धूल उड़ाते हुए अपनी गाड़ियाँ दौड़ाते थे अब ये सड़क बन गयी है तो वो अनुभव इतिहास की बात हो गयी…. तो यहाँ से अच्छी सड़क मिल गयी तो हमारी गाड़ी ने रफ़्तार पकड़ ली…मूर मैदान में गाड़ी दौड़ाते हुए आपको दूर दूर तक के दृश्य दिखते हैं.. दाई तरफ की पर्वत श्रृंखला से लगता एक रास्ता पूर्व दिशा में जाता है जो सो मोरिरी झील के बगल से होते हुए दुनिया की सबसे ऊँची वेधशालाओं में से एक हानले वेधशाला की तरफ रास्ता जाता है…खैर हमारी गाड़ी दौड़ते हुए इस रास्ते के सबसे ऊंचे और दुनिया के दूसरे सबसे ऊँचे दर्रे तांगलांग ला पर पहुँची जिसकी ऊँचाई 5328मीटर (17480फ़ीट) है… यहाँ गाड़ी खड़ी कर के हमने कुछ फोटो ली लेकिन ऑक्सीजन इतनी कम थी कि अनु तो तुरंत गाड़ी में चली गयी हम भी अधिकतम 5-7 मिनट रुके और फिर उतरना शुरू कर दिया….. पंग से रास्ता चौड़ा और अच्छा होने की वजह से तेज चल रहे थे लेकिन इतनी ऊँचाई पे अपनी क्षमता देखते हुए ही उसी चाल में गाड़ी चलानी चाहिए… रास्ते का अगला पड़ाव उप्शी था… इसे आप लेह का प्रवेशद्वार मान सकते हैं… यहाँ आपको फिर से अपनी गाड़ी का पंजीकरण कराना होगा… ये एक तिराहा भी है जहाँ से एक रास्ता पूर्व में चुशूल और हानले की तरफ चला जाता है…तो उप्शी के बाद से आपको महान सिन्धु नदी का साथ मिल जायेगा… मन में बड़ी ख़ुशी हुई थी कि उत्तर भारत की दो महान नदियों गंगा और ब्रह्मपुत्र की घाटियों में बहुत समय बिताया था और अब तीसरी महान नदी का सानिध्य मिला था… उप्शी आते ही आपको अहसास हो जायेगा की आप लेह आ गये… तांगलांग ला दर्रे से लगातार ऊँचाई कम हो रही थी… आखिर 17440 फ़ीट की ऊँचाई से हम 11500फ़ीट की ऊँचाई पर आ गये थे… उप्शी से कारू होते हुए हम लेह पहुँचे… रास्ते में ही नेटवर्क आ गया और क्रमशः हमने घर के सभी सदस्यों की चिंता भरी कॉल रिसीव की और हलकी फुल्की डांट भी सुनी…. क्या करें हमारा भी दोष नहीं था… उस बियाबान रास्ते में नेटवर्क की क्या कहें, अगर मुसीबत में फंसते तो भगवान ही सुनने वाला था

लेह 11500फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित प्राचीन लद्दाख की राजधानी और सम्प्रति भारत का दूसरा सबसे बड़ा जिला है…( शायद 2-4 प्रदेशों से भी बड़ा हो) ये ऊँचाई मानव पर्यावास के लिए उपयुक्त है… बगल में बहती सिन्धु नदी इस शहर की जलापूर्ति सुनिश्चित करती है… जब पहुँचे तो दोपहर के 2 बज रहे थे, हम होटल में कमरा लेके कुछ स्थिर हुए… अगली चिंता थी नुब्रा और पंगांग सो झील जाने के लिए जिलाधिकारी कार्यालय से अनुमति पत्र लेना… हम इतना थके हुए थे कि हमने बहुत जोर नहीं लगाया, इसके लिए सारी प्रक्रिया समझ के हम कमरे पे आराम करने आ गए… अनु दवाई खाने के बाद अब कुछ आराम में थी… कुछ आराम करके रात में खाना खाने निकले.. सौभाग्यवश खाना अच्छा मिल गया… तो फिर कमरे में आकर हम कटे पेड़ की तरह गिर पड़े और गहरी नींद में सो गए… अगले दिन हमें पास भी बनवाना था और दुनिया के सबसे ऊँचे रास्ते पे जाना था

बस एक ही अफ़सोस आज भी होता है लेह जाने का इतना दुर्गम काम करने के बावजूद हमारे पास एक ही चीज नही थी और वो था समय

लम्बी यात्रा और खतरनाक रास्तों से होते हुए हम सब लेह पहुँच चुके थे…. थकान इतनी थी कि समय होने के बावजूद भी हम वहाँ के जिलाधीश कार्यालय में पास नहीं बनवा पाए…. पहुँचने की रात हमने केवल आराम किया… अगली सुबह हम दोनों भाई तैयार हुए और जिलाधीश कार्यालय पहुँच गए… हर जगह की तरह यहाँ के भी स्थानीय टैक्सी यूनियन और होटल वाले यहाँ के कार्यालय में हावी हैं… अगर आप अपने निजी वाहन से हैं तो ठीक नहीं तो यहाँ के महंगे टैक्सी चालकों के चंगुल में फँसना तय है…. एक उदाहरण दूँगा, मेरे जौनपुर से लेह तक आने जाने में कुल 14000 रुपये का डीजल लगा जबकि लेह से केवल हुन्डर घाटी और पंगांग त्सो झील जाने के लिए आपसे वहाँ के टैक्सी वाले 15 से 20 हजार रुपये तक मांगेंगे, वो भी आपको उनकी शर्तों पे चलना होगा… खैर 10 बजे कार्यालय खुला और 11 बजे तक पास हमारे हाथ में था… हम तुरंत भाग कर होटल आये और अपनी अगली यात्रा (हुन्डर घाटी और पंगांग त्सो झील) के लिए निकल पड़े

अब थोडा अपनी यात्रा के अगले मुकाम के बारे में बताना चाहूँगा… लेह से उत्तर में लगभग 120किमी की दूरी पर हुन्डर घाटी है जो नुब्रा घाटी के नाम से मशहूर है.. ये घाटी अपने काले बालू के टीलों, दो कूबड़ वाले ऊँट और रेगिस्तान जैसी संरचना के लिए प्रसिद्ध है… और ये रास्ता दुनिया के सबसे ऊँचे वाहन चलने योग्य रास्ते से हो कर जाता है… जिसका नाम है खारदुंग ला पास…. जब से डिस्कवरी या अन्य टूरिज्म से जुड़े चैनल देख रहा था, जब से इस सड़क के बारे में जाना-सुना था तब से यही सपना देखा था कि कब इस सड़क पर खुद से गाड़ी चला के पहुंचू… इस सड़क का स्त्रातिजिक महत्व भी है क्योंकि यही सड़क सियाचिन बेस कैंप तक जाती है… 1976 में बनी ये सड़क 1988 में आम जनता के लिए खोली गयी

हम होटल से लगभग 12 बजे के आस पास निकल लिए…. बड़ा मसला ये हुआ कि हम दोनों भाइयों के मन में था कि दुनिया के सबसे ऊँचे रास्ते पर गाड़ी चला के ले जाएँ… आखिर तय हुआ की वहाँ तक मैं चढाऊंगा, उतरते वक़्त गाड़ी तुम चलाना… भाई मान भी गया… इतनी गाड़ी चलाने के बाद हम दोनों की गाड़ी चलाने की खुजली ख़त्म नहीं हुई… खारदुंग दर्रा लेह से 39 किमी दूर है… इसकी ऊँचाई 18380 फ़ीट या 5602मीटर है.. सीधी सी बात है चढ़ाई बहुत ज्यादा है लेकिन दुर्गम नहीं कहूँगा जैसा पिछला रास्ता हम सब देखते हुए आये थे… दर्रे से कुछ पहले की सड़क बन रही थी तो वहाँ थोडा दिक्कत हुई बाकि तो सब ठीक ही रहा और थोड़ी देर बाद हम खारदुंग ला पास पर थे… इस ऊँचाई पर पहुँचने का हमने भी उल्लास मनाया थोड़ी देर फोटोग्राफी की… न जाने कब का सपना पूरा हुआ था… और ख़ुशी भी… शायद हम पहले हैं जिन्होंने बलेनो कार वहाँ पहुँचाई…. चारों तरफ बर्फ की मोटी चादर बिछी हुई थी.

वहाँ से भाई ने गाड़ी की स्टीयरिंग सम्हाल ली और हम सावधानी पूर्वक नीचे उतरने लगे.. उस तरफ बर्फ़ का जमाव ज्यादा था… पर्याप्त नीचे आये तो हमें सेना का ट्रांजिट कैंप मिला, सैनिकों के वेश देख कर लगा कि आगे जाने की तैयारी कर रहे हैं.. खारदुंग गाँव के पास पहुँच के हमने गाड़ी रोकी और नाश्ता किया…. यहाँ के लोग बहुत सीधे और सरल हैं.. इस दुर्गम क्षेत्र में कोई भी आपकी भूख और आवास की जरुरत का फायदा उठा सकता है लेकिन ये सीधे लोग बहुत कम पैसे में हँसते हुए आपकी सेवा करते हैं…  कुछ आगे जाने पर हम श्योक नदी का किनारा पा गए और इन वीरान धूल के पहाड़ों के बीच से होते हुए नुब्रा घाटी तक पहुँच गए

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नुब्रा घाटी श्योक और नुब्रा नदी के संगम के पास स्थित है… यहाँ आने पर आपको कई नाम सुनाई देंगे यथा नुब्रा घाटी, दिस्कित, हुन्डर, पनामिक, सुमुर… लेकिन रुकने के लिए सबसे उपयुक्त दिस्कित गाँव या हुन्डर घाटी ही है… पहले यहाँ पहुँचने के बावजूद में हमने लगभग 40-50 किमी फालतू गाड़ी दौड़ाई क्योंकि यहाँ से घूमने के बाद हम सुमुर की तरफ गए.. यहाँ से पनामिक 40 किमी दूर है जो गर्म पानी स्रोत है तो आप वहाँ भी जा सकते है… खैर हम जब नुब्रा में हुन्डर घाटी में पहुँचे तो शाम हो चुकी थी… यहाँ अगर नदी ना होती तो ये जगह किसी भी तरह रेगिस्तान से कम ना होती.. प्राचीन काल में ये जगह सिल्क मार्ग का हिस्सा थी और बक्ट्रिया से आने वाले ऊँट छोड़ कर यहाँ से व्यापारी घोड़े ले कर आगे जाते थे.. बैक्ट्रियन ऊंटों की वो खास नस्ल आज भी यहाँ बची है और पर्यटन का मुख्य आकर्षण है… हम भी रेत के टीलों पर दौड़े और बैक्ट्रियन ऊंटों के साथ फोटो ली… हमारे सामने सूरज की रौशनी तेजी से पश्चिम में भागी जा रही थी… अद्भुत नजारा था घाटी में अँधेरा हो चुका था लेकिन पहाड़ों पर धूप होने की वजह से घाटी में पर्याप्त उजाला था… फिर हमने अज्ञानतावश गाड़ी सुमुर तक दौड़ाई और लगभग 40 किमी फालतू गाड़ी चलाने के बाद हम वापस दिस्कित आये और रात वहाँ अच्छे से होटल में रुके… दिन भर की थकान मिट जाती है अगर रुकने और भोजन का इंतजाम अच्छा हो जाये.. वैसा ही हुआ

अगली सुबह हमें पंगांग त्सो झील के लिए निकलना था… ये झील किसी पहचान की मोहताज नहीं है.. 3 इडियट और सनम रे जैसी फिल्मों में इसका फिल्मांकन होने के बाद बच्चा बच्चा इस झील को अच्छे से जानता है

इस कथा के अंतिम भाग में ही सबसे ज्यादा रोमांच का अनुभव हुआ… दिस्कित में रात बिता कर उठा तो हुन्डर घाटी की सुबह ने मन मोह लिया… कैमरा ले कर उन यादों को संजोया और फिर प्रतीक और अनु को उठाया… हम सभी तैयार हो कर सुबह ही पंगांग त्सो झील के लिए निकल पड़े.. एक यात्री ने बताया था कि अधिकतर रास्ता श्योक नदी की घाटी में है तो सुबह जितना जल्दी निकलें श्रेयस्कर होगा

नुब्रा से पंगांग त्सो झील के रास्ते के बारे में बताना चाहता हूँ कि इन दोनों स्थानों के बीच कम दूरी होने के बावजूद कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के चलते पुराना रास्ता 272 किमी का था… जो कि बहुत कठिन था… अभी 5-6 साल पहले से एक नया रास्ता खुला है जो इस दूरी को 100 किमी कम कर दिया है लेकिन ये रास्ता बहुत ही सुनसान और खतरनाक है… खासकर कि जब आप लो ग्राउंड क्लेअरेंस वाली गाड़ी ले कर चल रहे हों

हमने भी वही ख़तरनाक लेकिन छोटा रास्ता चुना… इतने दिन की लम्बी यात्रा के बाद मन का जोश तो ख़त्म नही हुआ था लेकिन शरीर असमर्थता जता रहा था क्योंकि हमने एक भी दिन आराम नही किया था… और इतनी ऊँचाई पर रहने के कारण सरदर्द और पेट की समस्या बनी हुई थी… दिस्कित से खालसर तक तो पिछला रास्ता ही था वहाँ से हमारा रास्ता अलग हुआ और हम श्योक नदी की घाटी में आगे बढ़ने लगे… सामने 3 इन्नोवा गाड़ियों का काफ़िला था जिससे इस सुनसान में थोडा आत्मविश्वास बना हुआ था… और कुछ दूर जाते ही पता चाल गया की सुबह निकलने की सलाह क्यों मिली थी… सुबह के समय रास्तों पे पड़ने वाले झरनों में पानी कम होता है जो दिन बढ़ने के साथ बढ़ता ही जाता है

रास्ते में अगम पार करने के बाद नदी के पुल के पास इस सुनसान में केवल एक बी आर ओ की चौकी मिली… यहाँ तैनात जवान मुजफ्फरपुर के ही थे… उन्होंने बोला कि आपको ये नीरवता अच्छी लग रही है हम इसी नीरवता में दिन रात जीते हैं… नदी के पानी के शोर के अलावा उनके जीवन में किसी तरह का शोर नहीं….. नेटवर्क का अता-पता नहीं… उन्होंने आगे के रास्ते के बारे में चेताया कि आगे नदी की घाटी में सड़क बह गयी है तो आने जाने वाली गाड़ियों के टायरों के निशान को देखते हुए ही आगे बढे….. नदी की सुन्दर घाटी में हमारा मन हुआ रुक के थोडा समय बिताने का और यहीं हमसे एक बड़ी गलती हो गयी… छोटे भाई ने बगल की रेत में गाड़ी खड़ी कर दी और केवल 1 मिनट में अगले पहिये रेत में धँस गए… अब हम लाचार थे…. तभी उधर से टेम्पो ट्रावेलेर में कुछ लोग आ रहे थे… वो लोग रुके और उनकी मदद से हम जल्दी ही गाड़ी बाहर निकाल लिए…. फिर कान पकडे कि अब गाड़ी सड़क से नीचे नहीं उतारनी

श्योक नाम का एक क़स्बा है, उसको पार करते हुए हमने श्योक नदी का साथ छोड़ दिया… आगे कुछ दूर रास्ता बहुत ही खतरनाक था… दुरबुक पहुँच कर हमें लेह-पंगांग त्सो रास्ता मिल गया और लगभग 12 बजे तक हम पंगांग त्सो झील पहुँच गए…. अहा !!! क्या दृश्य था वो… जैसे ही एक पहाड़ी मोड़ के बाद हमें झील दिखी, हम रास्ते भर की सारी परेशानियाँ भूल गए.. पंगांग त्सो जो दुनिया की सबसे ऊँची खारे पानी की झील है…. 4350 मीटर (14270फ़ीट) पर स्थित लगभग 300 किमी लम्बी और औसतन 5 किमी चौड़ी इस झील का लगभग 40% हिस्सा भारत में है… अभी हाल ही में आपने यहाँ चीन से हुए विवाद के बारे में सुना होगा… चारों तरफ हिमाच्छादित पर्वतों से घिरी ये झील आपको ईश्वर की अनुपम कृतियों में से एक लगेगी… और इस स्वर्गिक अनुभूति का अनुभव करने का और कोई तरीका नहीं है बजाय यहाँ आने के

जब वहाँ गाड़ी खड़ी हुई तो सबसे ज्यादा मेरी तबियत ख़राब थी…. शरीर का निर्जलीकरण हो गया था और पनारा खुल चुका था… वहाँ एक ढाबे पे नाश्ता कर के हम झील के किनारे फोटो लेने गए… हमारी तबियत इतनी सुस्त थी कि किसी भी फ़ोटो में वहाँ पहुँचने का अपेक्षित उल्लास नहीं दिखता… हम झील के किनारे गाड़ी खड़ी कर के एक घंटा सोये… उठने के बाद कुछ ताकत महसूस हुई तो कुछ और फोटो लेने के बाद हम वापस निकल लिए… आज भी अफ़सोस होता है कि काश वहाँ और समय दिया होता

वापसी का रास्ता दुरबुक से अलग था… पूरा रास्ता अच्छा था लेकिन पूरे रास्ते की कसर चांग ला दर्रे ने निकाल ली…. ये दर्रा सारे दर्रों में से सबसे कठिन है… हिमस्खलन की केवल इसी दर्रे पे चेतावनी मिली…. बाकी दर्रों पे भूस्खलन की मिली…. साला रास्ता बर्फीला और फिसलन से भरा था… 5360 मीटर (17585 फ़ीट) की ऊँचाई पर स्थित ये दर्रा तीसरा सबसे ऊँचा दर्रा है…. उसके बाद का रास्ता अच्छा ही था… जैसे जैसे हम लेह की तरफ आते गए ऊँचाई कम हुई और तबियत भी सही लगने लगी…. लेह पहुँचते पहुँचते शाम के 6 बज गए…. होटल में आके हमने केवल आराम किया…. और वापसी की योजना बनाने लगे… श्रीनगर अभी भी सुलग रहा था तो हमने कारगिल के रास्ते से जाने का विचार छोड़ दिया.. योजना बनी कि अगली सुबह लेह की कुछ स्थानीय घुमक्कड़ी कर के मनाली के रास्ते पे निकलेंगे और जिस्पा में एक रात रुक कर तब मनाली चलेंगे

कभी कभी अपनों का याद करना हमारे लिए कितना फायदेमंद होता है इसकी बानगी हमें अगली सुबह मिली… हम आराम से अपने नित्यकर्म से निवृत्त हो रहे थे क्योंकि आज के दिन ज्यादा सफ़र नहीं करना था.. तभी छोटी मौसी का फ़ोन आया (वो सपरिवार मनाली घूमने आई हुई थीं) और उनसे बात करने पे याद आया कि अगला दिन मंगलवार है और उस दिन रोहतांग दर्रा मरम्मत के लिए बंद रहता है… हमारे कान खड़े हो गये क्योंकि अब हमें आज ही मनाली पहुँचना था.. आनन-फानन में हम तैयार हुए और 8 बजे लेह से मनाली के लिए निकल पड़े…. 473 किमी का लम्बा, पहाड़ी और खतरनाक रास्ता हमें एक दिन में तय करना था… छोटे भाई ने कमान सम्हाली और सरचू तक गाड़ी उसने चलाई… सरचू में हमने उसी ढाबे में खाना खाया….. अब ड्राइविंग सीट पे मै था आगे बारालाचा ला दर्रे पे जाम और खतरनाक मौसम मिला… आगे जो सबसे बड़ी समस्या मिली वो रास्ते पे बहते झरनों के रूप में थी…. 3 बड़े झरने में गाड़ी को बिना रोके निकालने में नीचे चेस्सिस में  कुछ नुकसान भी हुआ और नोक-झोंक भी हुई…. गाड़ी में सन्नाटा छाया हुआ था और हम तेजी से जिस्पा, दारचा, केलोंग पार करते हुए खोक्सर आ गए…. जब हम रोहतांग दर्रे पर चढ़ने लगे तो अँधेरा होना शुरू हो चुका था और चढ़ाई के वक़्त का ख़राब रास्ता पूरे रास्ते का सबसे ख़राब रास्ता था… भगवान की कृपा थी कि किसी भी मौके पे हमें गाड़ी ने धोखा नहीं दिया… रोह्तंद दर्रे इतनी पिघली बर्फ थी जैसे सड़क पे कोई छोटी मोटी नदी हो… उस पार का रास्ता अच्छा था लेकिन एकदम रात के अँधेरे में टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर काफी सावधानी बरतनी पड़ी… रात 9.30 पर हम मनाली में थे और वहाँ पहुँच के हमने राहत की साँस ली…. खाना खा कर होटल में हम सभी आराम करने आ गए

अगली सुबह हमने अपनी थकान के वशीभूत हो कर मनाली से अपनी यात्रा सुबह 10 बजे शुरू की… लक्ष्य था दिल्ली, तारीख थी 6 जून.. मैंने छोटे भाई को पूछा तो गाड़ी चलाओगे तो बोला नहीं आज तुम दिल्ली ले चलो कल मैं चलाऊंगा… मनाली में होने वाली भीड़ का आप लोगों से जिक्र किया ही था…. उसका नमूना देखिये मनाली से मंडी 60किमी दूर है और ये दूरी तय करने में हमें 4 घंटे लग गये और 2 बजे हम मंडी से आगे निकल पाए अब ट्रैफिक उतना तो नहीं था लेकिन इतन कम भी नहीं था कि इन पहाड़ी रास्तों में मन मुताबिक गाड़ी चला पायें… मनाली से दिल्ली की दूरी 537 किमी है… पहाडों को पार करते हुए भाखड़ा बांध के बगल से हम पंजाब के मैदान में उतरे… हम सभी पिछले कई दिनों से पहाडों के बीच थे तो अब राहत भारी साँस ली.. खासतौर पे अनु ने… पंजाब पर करते हुए इस राज्य की एक बुरी याद यहाँ के ट्रैफिक पुलिस वालों ने जबरदस्ती परेशान कर के दी…. चंडीगढ़ बाईपास से होते हुए हम जम्मू दिल्ली राजमार्ग पे आ गए…. एक बार 6 लेन सड़क पे चढ़ना था कि फिर तो गाड़ी को पर लग गये… हरियाणा पर करते हुए जब हम दिल्ली पहुँचे तो रात के 11 बज रहे थे… आज 13 घंटे मैंने लगातार गाड़ी चलाई थी…. आते ही मैं तो सो गया, प्रतीक और अनु ने मिल के खाना बनाया और मुझे जगा के खिलाया

अगली सुबह 6 बजे हम फिर से कार में थे और जैसा तय हुआ था आज छोटे भाई साहब दिल्ली से घर(जौनपुर) तक गाड़ी चलाने वाले थे…. यमुना एक्सप्रेस वे फिर आगरा लखनऊ एक्सप्रेसवे से होते हुए हम सब लखनऊ आये… लखनऊ से बाहर रुक के एक जगह चाय पी और शाम 6 बजे तक हम जौनपुर आये… घर पर बड़े पिता जी का शुद्धक था… हमें डर था कि पता नहीं घर वालों की प्रतिक्रिया कैसी होगी लेकिन सभी ने शाबासी दे कर हम तीनों यात्रियों और दोनों चालक भाइयों का उत्साहवर्धन ही किया… इस तरह से हमारे जीवन की सबसे लम्बी और यादगार यात्रा का समापन हुआ

यात्रा का कुछ विवरण निम्न है

तय की गयी दूरी- 4950 किमी

तय की गयी अधिकतम ऊँचाई – 18380 फ़ीट (खारदुंग ला)

कुल दिन – 11 (गाड़ी प्रतिदिन औसतन 450किमी चली)

ईंधन (डीजल) लगा – 14000 रुपये का (लगभग 233 लीटर और एवरेज रहा 21.24किमी/लीटर का)

प्रदेश- उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़, जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश

लेकिन घूमने की भूख यथावत है……………..

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Written by Abhishek

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पातलकोट की अनोखी दुनिया